
वो जब थी ,
तो कुछ यूं भी किया करती थी .........................
हाथॉ में लिख के मेरा नाम
अपनी होठों से चुमा करती थी
हाथॉ में लिख के मेरा नाम
अपनी होठों से चुमा करती थी
फिर दुप्पट्टे के उस किनारे को
ऊंगलियों मे मोडा करती थी
शर्माती थी, कुछ घबडाती थी
फिर पलके उठाये मुझको, एक टक निहारती थी
ओ जब थी, तो कुछ यूं भी किया करती थी ....................
उसके लम्बे खुले बाल कमर तक लहराते थें
हवा के झोंको से उड कर
चेहरे को ढंक जाते थें
फिर सम्भालती अपनी जुल्फों को
कोइ गीत गुनगुनाती थी
कभी रूठ्ती , कभी जलाती थी
कभी कान्धे से टिक के मेरे ,
सपने कई बनाती थी
वो जब थी ,
तो कुछ यूं भी किया करती थी ............................
बारिश की लेके बूंदें,
वो खुब इठ्लाती थी
पास जो उसके जाऊं,
दूर निकल जाती थी !
चलना है साथ तुम्हारे,
बस यही मुझे समझाती थी
कभी चुप सी थी,
कभी गुम सी थी,
कभी आंखों के छलकते आंसू,
यूं ही पिया करती थी,
वो जब थी, तो कुछ यूं भी किया करती थी......................
अब नही है वो!
न आयेगी कभी...
अब न कोई लम्हा बनायेगी कभी
आज याद आ रहा है,
रूठ के उसका जाना
लाख मनाने पर भी,
वापस नही आना
अब मैं समझा हूं वो क्यों,
कुछ यूं भी जिया करती थी,
वो जब थी,
तो कुछ यूं भी किया करती थी.................
-------------------dimagless
kafi dard hai is jigar me
ReplyDeleteemotions kabhi kabhi dil me bahut ander tak chupe hote hain .. jo kabhi kisi kavita ya mail..ya daru ke daur ke baad samne ate hai..kabhi tanhai me kabhi dostob ke saath jab bhi ye baher atein hain..kambaqht jaan le lete hain ..
ReplyDeletemai samjhta hu is baat ki ..kisi ke paas hone ka kya matlab hai ..aur jiske paas rahna chaein aap uske door jane ka kya matlab hota hai....
wo jab thi
it seems, every single word comes straight from ur soul...as if u hv lived those moments..
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